सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी परिवहन विभाग में भ्रष्टाचार का खेल है बदस्तूर जारी गाजियाबाद में अनाधिकृत लोग विगाग के कर्मचारियों की लोग-इन आईडी से कर रहे हैं जमकर खेल


गाजियाबाद। भ्रष्टाचार रोकने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी गाजियाबाद परिवहन विभाग सुधरने को तैयार नजर नहीं आ रहा। आलम यह है कि यहाँ कोई भी कार्य बिना दलालों के करवाना संभव नहीं है। प्रत्येक कार्य के लिए यहाँ रेट तय हैं और यदि आप सीधे रास्ते से जाकर यहाँ कोई कार्य करवाने की सोच भी रहे हैं तो आपको निराशा ही हाथ लगेगी। विभाग के कर्मचारी आपकी यहाँ आने पर ऐसी चकरघिन्नी बनाएंगे कि मजबूरन आपको दलाल की शरण लेनी ही पड़ेगी।


गाजियाबाद परिवहन विभाग में रूम नंबर-18 ने तो भ्रष्टाचार की मानों सारी हदें ही पार कर ली हों। अगर आप किसी कमर्शियल वाहन के स्वामी हैं और आपको इसका रेजिस्ट्रेशन करवाना है तो आपका वास्ता रूम नंबर-18 से अवश्य पड़ेगा। यहाँ सीधे आने पर आपको यहाँ के बाबू धर्मेंद्र कुमार शर्मा और राजेंद्र सोनकिया का रटा-रटाया जवाब मिलेगा कि पहले आप एआरटीओ साहब से मार्किंग करवा कर लाइए। एआरटीओ के नाम से ही कुछ लोग तो निराश होकर बीच का रास्ता निकालने पर मजबूर हो जाते हैं। यदि कुछ लोग हिम्मत कर एआरटीओ तक जाने का साहस कर भी लेते हैं तो कई दिनों तक मारा-मारा फिरने के बाद उन्हें भी आखिरकार बीच का रास्ता ही अपनाने पर मजबूर होना पड़ता है। इसके बाद शुरु होता है असल खेल।


रेजिस्ट्रेशन करवाने आए व्यक्ति को सरफराज, नरेंद्र और ओपी नामक लोगों के हवाले कर दिया जाता। हालात यह हैं कि इन सभी लोगों का रूम नंबर-18 में एक तरह से पूरा सिक्का चलता है। यह सभी लोग कौन हैं और परिवहन विभाग में किस हैसियत से जमे हैं इसका पता यहाँ के दो बाबूओं धर्मेंद्र कुमार शर्मा और राजेंद्र सोनकिया के अलावा किसी को नहीं है। परंतु सरफराज, नरेंद्र और ओपी का रुतबा इतना है कि यह सभी लोग बे रोकटोक तरीके से परिवहन विभाग के बाबूओं, धर्मेंद्र कुमार शर्मा और राजेंद्र सोनकिया, की आईडी से विभाग की साइट पर सीधे लोग-इन तक करने का माद्दा रखते हैं।


इन सभी लोगों का रसूख देखकर परिवहन विभाग में ही लोग दबी जुबान से कानाफूसी भी करने लगे हैं। लोग सवाल उठाने लगे हैं कि आखिरकार इन लोगों को किसने इतने अधिकार दिए हैं कि यह सभी लोग बेखोफ होकर रूम नंबर-18 की लोग-इन आईडी तक इस्तेमाल कर रहे हैं? इन लोगों की शरण में पहुँचने वाले लोगों को काम के हिसाब से दाम तो खर्चने पड़ते हैं परंतु इसके बाद उनका रुका हुआ काम बिना किसी हिलाहवाली के महज 1 से 2 दिन में पूरा होना तय है।

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